उत्तराखण्ड राजनीति रुद्रप्रयाग

राम लहर के बाद पर्वतीय क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी को मिला अपार जन समर्थन
केदारनाथ सीट पर ज्यादातर भाजपा का ही रहा कब्जा,
केदारनाथ सीट पर 1989 के बाद वर्ष 2012 में काबिज हुई थी कांग्रेस,
2017 के चुनाव में भाजपा की आशा के बगावती तेवर ने कांग्रेस को पुनः दिलाई जीत

अगस्त्यमुनि। केदारनाथ सीट का चुनाव हमेशा से ही रोचक रहा है। साथ ही यहां के वोटरों का मिजाज भी काफी रोचक रहा है। हर बार नया सीमांकन होने पर इसका नाम तो बदलता रहा, मगर मिजाज नहीं बदला। भारतीय जनता पार्टी के गठन से पूर्व यहां के वोटरों ने पार्टी से अधिक व्यक्ति को महत्व दिया है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी के उदय और राम लहर के बाद यहां की जनता ने भारतीय जनता पार्टी पर ही अपना विश्वास जताया। यह विश्वास उत्तराखण्ड बनने के बाद भी बरकरार रहा।
वर्ष 1951 में उत्तर प्रदेश के पहले आम चुनाव से लेकर 1974 के आम चुनाव तक यह सीट कभी गंगाधर मैठाणी के पास रही, तो कभी नरेन्द्र सिंह भंडारी के पास। इस दौरान दोनों ने ही कई बार पार्टी बदल कर और कई बार निर्दलीय रहकर चुनाव जीता। 1951 के पहले आम चुनाव में यह सीट 06 चमोली पश्चिम सह पौड़ी उत्तर के नाम से जानी जाती थी। इस चुनाव में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार गंगाधर मैठाणी, कांग्रेस के केएन गैरोला को हराकर पहले विधायक बने। 1957 में नया सीमांकन होने के बाद यह सीट 07 केदारनाथ बनी। इस चुनाव में कांग्रेस के नरेन्द्र सिंह भण्डारी, निर्दलीय गंगाधर मैठाणी को हराकर विधायक बने। 1962 में गंगाधर मैठाणी फिर से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में आकर विधायक बने। उन्होंने कांग्रेस के नरेन्द्र सिंह भण्डारी को हराया। वर्ष 1967 में फिर से सीमांकन होने से इस सीट का नाम 08 बद्री-केदार हो गया। इसके साथ ही गंगाधर मैठाणी ने कांग्रेस में आकर निर्दलीय नरेन्द्र सिंह भण्डारी को हराकर इस सीट पर कब्जा किया। 1969 के चुनाव में नरेन्द्र सिंह भण्डारी ने निर्दलीय चुनाव लड़कर कांग्रेस के गंगाधर मैठाणी को हरा दिया। वर्ष 1974 में भारतीय जनसंघ के बनने के बाद प्रताप सिंह पुष्पाण ने चुनाव लड़ा, मगर कांग्रेस के नरेन्द्र सिंह भण्डारी से पार नहीं पा सके और 1977 में इमर्जेन्सी के बाद जन्मी जनता पार्टी के टिकट पर लड़कर प्रताप सिंह पुष्पाण ने नरेन्द्र सिंह भण्डारी से अपनी हार का बदला चुकाया। वर्ष 1980 में कुंवर सिंह नेगी निर्दलीय विधायक बने। उन्होंने कांग्रेस के नरेन्द्र सिंह भण्डारी को हराया। वर्ष 1985 में पुनः सीमांकन होने से यह सीट 07 बद्री-केदार बन गई। इस बार कांग्रेस ने सन्तन बड़थ्वाल को टिकट दिया और उन्होंने लोकदल के कुंवर सिंह नेगी को हराया। 1989 के चुनाव में कुंवर सिंह नेगी कांग्रेस के टिकट पर पुनः विधायक बने। उन्होंने जनता दल के सुदर्शन कठैत को हराया। 1991 की राम लहर ने पर्वतीय क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी को अपार जन समर्थन दिया। पार्टी के उम्मीदवार केदार सिंह फोनिया ने 1991, 1993 तथा 1996 में तीन बार इस सीट पर विजय प्राप्त की। 1991 तथा 1993 में उन्होंने कांग्रेस के कुंवर सिंह नेगी को हराया तो 1996 में कांग्रेस के सत्येन्द्र बर्तवाल को। वर्ष 2000 में उत्तराखण्ड के गठन के बाद हुए पहले चुनाव 2002 में यह सीट 37 केदारनाथ से जानी गई। सीट का नाम तो बदला, मगर जनता का मिजाज वही रहा। 2002 के चुनाव में भाजपा की आशा नौटियाल ने कांग्रेस की शैलारानी रावत को हराया और इस सीट पर पहली महिला विधायक बनने का गौरव हासिल किया। वर्ष 2007 में एक बार फिर भाजपा की आशा नौटियाल विधायक बनी। इस बार उन्होंने कांग्रेस के कुंवर सिंह नेगी को हराया। 2012 में सीटों का सीमांकन नये सिरे से हुआ तो यह सीट फिर से 07 केदारनाथ में बदल गई। इस बार कांग्रेस ने शैलारानी रावत पर दांव खेला और उन्होंने आशा नौटियाल का विजयी रथ रोककर 1989 के बाद इस सीट पर कांग्रेस को विजय दिला दी।
वर्ष 2016 में कांग्रेस में भारी बगावत हुई और शैलारानी रावत ने भाजपा का दामन थाम लिया। भाजपा ने आशा नौटियाल का टिकट काटकर शैलारानी रावत को अपना प्रत्याशी बनाया। आशा नौटियाल निर्दलीय लड़ी और इसका फायदा कांग्रेस के उम्मीदवार मनोज रावत को मिला और उन्होंने पूरे प्रदेश में प्रधानमंत्री मोदी की सुनामी के बाबजूद यह सीट जीत ली। अब संग्राम 2022 का है। एक ओर कांग्रेस से मनोज रावत की उम्मीदवारी पर कोई संशय नहीं है तो वहीं भाजपा को अपना उम्मीदवार तय करना है। इस बार आप भी अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराने को तैयार है तो उक्रांद भी गजपाल रावत को उम्मीदवार घोषित कर चुनावी समर में कूद चुकी है। वहीं निर्दलीय कुलदीप रावत पूरे दमखम के साथ पिछली हार का बदला चुकाने चुनाव में उतरें हैं तो कई अन्य निर्दलीय भी अपना भाग्य आजमाने को तैयार हैं। ऐसे में यह देखना रोमांचक होगा कि इस बार जनता का मिजाज किसको विधायक बनाता है। 

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